व्याकरण हिंदी देवनागरी लिपि

देवनागरी लिपि में बाईऔर से दाएं और लिखा जाता है। यह एक वैज्ञानिक लिपि है। यह एक मात्र ऐसी लिपि है जिसमें स्वर तथा व्यंजन ध्वनियों को मिलाकर लिखे जाने की व्यवस्था है। संसार की समस्त भाषाओं में व्यंजनों का स्वतंत्र रूप में उच्चारण स्वर्ग के साथ मिलकर किया जाता है पर देवनागरी के अथवा विश्व में कोई भी ऐसी लिपि नहीं जिसमें व्यंजन और स्वर को मिलाकर लिखने लिखे जाने की व्यवस्था हो। यही कारण है कि देवनागरी लिपि अन्य लिपियां की तुलना में अधिक वैज्ञानिक लिपि है। अधिकांश भारतीय भाषाओं की लिपियां बाय और दाएं और ही लिखी जाती है। केवल उर्दू जोक फारसी लिपि में लिखी जाती है दाएं और से बाएं और लिखे जाते हैं।

नीचे की तालिका में विश्व की कुछ भाषण और उनकी लिपियां के नाम दिए जा रहे हैं।

एक हिंदी संस्कृत मराठी नेपाली बोडो अंग्रेजी फ्रेंच जर्मन स्पैन, यह भाषा का देवनागरी लिपि है।

दूसरा इटालियन पॉलिश मिजो यह भाषा का रोमन लिपि है।

तीसरा पंजाबी यह भाषा गुरुमुखी लिपि है।

पचमा उर्दू अरबी फारसी यह भाषा का फारसी लिपि है।

छठ ऋषि बोलोगेरियन चेक रोमानिया यह भाषा का रूसी  लिपि है।

बांग्ला यह भाषा का बंगला लिपि है।

सातवां ओरिया यह भाषा का उड़िया लिपि है।

आत्मा असमिया या भाषा का असमिया लिपि है।

हिंदी में लिपि चिन्ह इस प्रकार,

देवनागरी के वर्णों में 11 स्वर और 41 व्यंजन है। व्यंजन के साथ स्वर्ण का सहयोग होने पर सवार का जो रूप होता है उसे मात्र कहते हैं,

जैसे, अ, आ इ, ई,, क , का, कि, कु, कू, के, कै,को,कौ,

देवनागरी देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है तथा ग्रामीण लिपि से विकसित हुई है विद्वानों का मानना है कि ब्राह्मी लिपि से देवनागरी का विकास सीधे सीधे नहीं हुआ है बल्कि यह उत्तर शैली की कुटिल शारदा और प्राचीन देवनागरी के रूप में होता हुआ वर्तमान देवनागरी लिपि तक पहुंचा है। प्राचीन नगरी के के दो रूप विकसित हुए पश्चिमी तथा पूर्वी। इन दोनों रूपों से विभिन्न लिपियों का विकास इस प्रकार हुआ।

प्राचीन देवनागरी लिपि पश्चिमी प्राचीन देवनागरी लिपि गुजराती महाजनी राजस्थानी महाराष्ट्र नागरी,

पूर्वी प्राचीन देवनागरी, कैथी मैथिली निवारी उड़िया बांग्ला असमीज,

संक्षेप में ब्राह्मी लिपि से वर्तमान देवनागरी लिपि तर्क के विकास क्रम को निबंध लिखित आरेख से समझा जा सकता है,

ब्राह्मणी उत्तरी शैली गुप्त लिपि कुटीर लिपि शारदा लिपि प्राचीन नागरी लिपि,

प्राचीन नागरी लिपि, पूर्वी नगरी मैथिली काठी निवाड़ी बांग्ला असमियाआदि। पश्चिमी नागरिक गुजराती राजस्थानी महाराष्ट्र महाजनी नगरी या देवनागरी।

दक्षिणी शैली, देवनागरी लिपि के निम्नांकित विशेषताएं है।

1, अ,आ, इ, ओ, और, आओ, की मात्राएं व्यंजन के बाद जोड़ी जाती है जैसे का की को कॉल पर सही की मात्रा व्यंजन के पहले ए और आए की मात्रा व्यंजन के ऊपर तथा दुर्गा होगी मात्राएं नीचे लगाई जाती है,

दूसरा व्यंजन में यू और दुर्गाहू, आधार आप प्लस हर्षागू बराबर दुर्गापुर। आधार प्लस दुर्गा बराबर रु।

तीसरा अनुस्वार, और: कम स्वर के ऊपर या बाद में जोड़े जाते हैं, जैसे आप प्लस अंक बराबर अंक। हां का प्लस ए बराबर कन,। अह। , का प्लस ए बराबर कह।

चौथा स्वरों की मात्राओं तथा अनुसार एवं: सहित एक व्यंजन वर्ण में बराबर रूप होते हैं। इन्हें परंपरा के अनुसार 12 खड़ी कहते हैं। जैसे क, का,कि, की, कु ,कू ,को, काऊ, कन, कह। व्यंजन दो तरह से लिखे जाते हैं खड़ी पाई के साथ और बिना खड़ी पाई के साथ।

पांचवा, अंगद छाता दादा दादा बिना खड़ी पाई वाली व्यंजन है और शेष व्यंजन जैसे का खा गा घा इत्यादि खड़ी पाई वाली व्यंजन है सामान्यत सभी वर्णों के सीधे पर एक-एक आदि रेखा रहती है जो घर झा और भाव में कुछ तोड़ दी गई है। छठ जब दो या दो से अधिक व्यंजनों के बीच कोई स्वर नहीं रहता तब दोनोंके मेल से संयुक्त व्यंजन बन जाते हैं। जैसे आधा का प्लास्टर बराबर कट । सातवा जब व्यंजन अपने सम्मान अन्य व्यंजनों से मिलता है तब उसे तृतीय व्यंजन कहते हैं जैसे कक्षा तक पत्ता गत्र में सम्मान यदि।

मारुति भाषा मातृभाषा कानून सिंह का जन्मपंजाबी भई परिवार में हुआ है इसलिए वह पंजाबी बोलना है। साक्षी शर्मा का जन्म हिंदी भाषी परिवार में हुआ है इसलिए वह हिंदी बोलती है। पंजाबी व हिंदी क्रमश उनकी मारती भाषाएं हैं।

इस प्रकार वह भाषा जिसे बालक अपने परिवार से अपनाते सकता है वह मातृभाषा कहलाती है। दूसरे शब्दों में बालक जिस परिवार में जन्म लेता है उसे परिवार के सदस्यों द्वारा बोली जाने वाली भाषा सबसे पहले सीखनाहै। यह मातृभाषा कहलाती है। प्रादेशिक भाषा, प्रादेशिक भाषा जब कोई भाषा एक प्रदेश में बोली जाती है तो उसे प्रादेशिक भाषा कहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय भाषा

अंतर्राष्ट्रीय भाषा जब कोई भाषा विश्व के दो या दो से अधिक राष्ट्र द्वारा बोली जाती है तो वह अंतरराष्ट्रीय भाषा बन जाती है। जैसे अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है।

राज्य भाषा, राजभाषा वह भाषा है जो देश के कार्यकालयों व राज्य काल में प्रयोग की जाती है राजभाषा कहलाती है। जैसे भारत की राजभाषा अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों है। अमेरिका की राजभाषा अंग्रेजी है।

मानक भाषा, मानक भाषा विद्वानों व शिक्षा वितरण द्वारा भाषा में एकरूपता लाने के लिए भाषा के जिस रूप का मान्यता दी जाती है वह मानक भाषा कहलातीहै। भाषा में एक ही वर्ग या शब्द के एक से अधिक रूप प्राचीन हो सकते हैं। ऐसे में उनके किसी एक रूप को विद्वानों द्वारा मान्यता दे दी जाती है, जैसे

गई बराबर गई मानक रूप भाषा ठंड बराबर ठंड मानक रूप अंत बराबर अंत मानक रूप का बराबर का मानक रूप शुद्ध बराबर शुद्ध मानक रूप।

वर्णमाला, वर्णमाला की परिभाषा वरन् उसे मुल्तानी को कहते हैं जिसके खंड या टुकड़े नहीं किया जा सकते हैं। जैसे आप हर सही वह चक्र का इत्यादि। वर्ण भाषा की सबसे छोटी इकाई है इसके और खंड नहीं किया जा सकते हैं। उदाहरण द्वारा मूल ध्वनि को यहां स्पष्ट किया जा सकता है। राम और गया में चार-चार मूल ध्वनियां है जिनके खंड नहीं किया जा सकते। रात प्लस हमें कर प्लस मां प्लस हमें कर बराबर राम। गांव प्लस ए प्लस या प्लस हमें खराब बराबर गया। इन्हीं अखंड मुल्तानी को वर्ण कहतेहैं। हर वर्णन की अपनी लिपि होती है लिपि को वर्ण संकेत भी कहते हैं हिंदी में 52 वर्ण है। वर्णमाला वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते हैं। हम ऐसे भी कर सकते हैं कि किसी भाषा के समस्त वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते हैं। प्रत्येक भाषा की अपनी वर्णमाला होती है। हिंदी बराबर अ आ का का खा गा,

अंग्रेजी, a,b,c,d,e,

वन के भेद हिंदी भाषा में वर्ण दो प्रकार के होते हैं।

1, स्वर vowel,2, व्यंजन, consonant,

1, सर्व भवनवे वर्णन है जिनके उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता की आवश्यकता नहीं होती स्वर्ग कहलाता है। इसके उच्चारण में कंठ तालुका उपयोग होता है जीव वोटका नहीं। हिंदी वर्णमाला में 16 स्वर है। जैसे हां अमित अग्रवाल शहीद हो गई हर साल दुर्गा हुए। स्वर के भेद स्वर के दो भेद होते हैं एक मूल स्वर दूसरा संयुक्तस्वर। मूल स्वर अनुक्रय सही दुबई हर्षद दुर्गा ओ, दूसरा संयुक्त स्वर ए आओ।

मुनीश्वर के भेद मूल स्वर के तीन भेद होते हैं एक हादसा हुआ दूसरा दीर्घायु उत्सव तीसरा फलत सवार एक हर्ष और जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है उन्हें हर्षवर्धन कहते हैं। हर्षल और चार होते हैं हमें कार पूरी की मात्रा री के रूप में लगाई जाती है तथा उच्चारण विधि की तरह होता है दूसरा दिखाओ सवाल विश्व वाले जिनके उच्चारण में हर साल स्वर्ग से दो गुना समय लगता है मैं दीमापुर कहलाते हैं 7 शब्दों में स्वरों के उच्चारण में अधिक समय लगता है उन्हें    दीर्घ स्वर करते हैं। दीर्घ स्वर्ग साथ होते हैं। अआ, इ, ऊ, ए, ऐ, ओ, आओ,। दिल गर्ल्स और दो शब्दों में योग से बनते हैं जैसे, आ, तीसरा पलूट स्वर , वे जिनके उच्चारण में तीन घर स्वर्ग से भी अधिक समय यानी तीन मात्राओं का समय लगता है पलुकेश्वर कहलाते हैं। सरल शब्दों में जी स्वर के विचार में देने में समय लगे उसे पर उत्साह कहते हैं इसका चिन्ह है , इसका प्रयोग अक्षर पुकाते समय किया जाता है जिसे सुनु राम ओम। हिंदी में साधारण के प्रयुक्त का प्रयोग नहीं होता वैदिक भाषा में पलट स्वर का प्रयोग अधिक हुआ है। इसे तेरी मैट्रिक स्वर भी कहते हैं। अंग आयोग वह कहलाते हैं वर्णमाला में इनका स्थान स्वरों के बाद और व्यंजनों के पहले होता है अंग को अनुस्वार तथा आपको: कहते हैं। अनुनासिक निर्गुण नासिक अनुस्वार और: अनुनासिक निम्नुनासिक और: हिंदी में स्वरों का उच्चारण अनुनासिक औरनिर्णसिक होता है

अनुस्वार और: व्यंजन है जो सर के बाद स्वर्ग से स्वतंत्र आते हैं इसके स्वर संकेत चिन्ह इस प्रकार है। अनुनासिक ऐसे स्वरों का उच्चारण नाक और मुंह से होता है और उच्चारण में लघुता रहती है जैसे गांव दांत अंगना सांचा आदि। अनुस्वार यशवर के बाद आने वाला व्यंजन है जिसकी धोनी नाक से निकलती है जैसे अंगूर अंगद कंचन। निरुनासिक केवल मुंह से बोले जाने वाला स्वर वर्णों को निर्णसिक कहते हैं। जैसे इधर उधर आप अपना घरइत्यादि।

20 साल अनुस्वार की तरह: ईश्वर के बाद आता है। यह व्यंजन है और इसका उच्चारण हां की तरह होता है संस्कृत में इसका कॉपी व्यवहार है हिंदी में अब इसका अभाव होता जा रहा है किंतु तत्सम शब्दों के प्रयोग में इसका आज भी उपयोग होता है।। टिप्पणी अनुसार और विचार करना तो सवार है ना व्यंजन किंतु यह स्वरों के सहारे चलते हैं। स्वर और व्यंजन दोनों में इनका उपयोग होता है जैसे अंगद रंग। इस संबंध में ईश्वर नहीं है और व्यंजनों की तरह यह स्वरों के पूर्व नहीं पश्चात आते हैं इसलिए व्यंजन नहीं है। इसलिए इन दोनों धोनी को आयोग के वह कहते हैं अयोगवाह का अर्थ है योग ना होना पर भी जो साथ रहे। अनुस्वार और अनुनासिक में अंतर अनुवांशिक के उच्चारण में नाक से बहुत कम सांस निकलती है और मुंह से अधिक जैसे आंसू हाथ गांव चिड़िया इत्यादि। पर अनुस्वार के उच्चारण में नाक से अधिक सांस निकलती है और मुख से कम जैसे हम अंश पांच अंगइत्यादि। अनुनासिक स्वर की विशेषता है अर्थात अनुनासिक सवारों पर चंद्रबिंदु लगता है लेकिन अनुसार का एक व्यंजन ध्वनि है। अनुसार की ध्वनि प्रकट करने के लिए वर्ण पर बिंदु लगाया जाता है तत्सम शब्दों के अनुसार लगता है और उनके तद्भव में चंद्रबिंदु लगता है जैसे एंगिप्ट से अंगूठा दांत से दांत अंतर सेआंख।

दूसरा व्यंजन कंसोनेंट जिन वर्णों को बोलने के लिए स्वर्ग की सहायता लेनी पड़ती है उन्हें व्यंजन कहते हैं। दूसरे शब्दों में उन वर्गों को कहते हैं जिनके उच्चारण में स्वर वर्णों की सहायता दी जाती है। जैसे का खा गा घा चाचा था दादा, एमएम बेसर तक सभी वर्ण व्यंजन है प्रत्येक व्यंजन के उच्चारण में आज की ढाणी छिपी रहती है आपके बिना व्यंजन का उच्चारण संभव नहीं है जिससे का प्लस का इमेजिंग ध्वनि है जिसके उच्चारण में भीतर से आई हुई वायु मुख में कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में बाधित होती है। स्वर्ग वन स्वतंत्र और व्यंजन वर्ण स्वर पर आश्रित है। हिंदी में व्यंजन वर्णों की संख्या 33 है। व्यंजनों के प्रकार व्यंजनों के तीन प्रकार होते हैं एक स्पष्ट व्यंजन दूसरा अंत सस्ती व्यंजन तीसरा उसमें व्यंजन

व्याकरण, मौखिक भाषा

मौखिक भाषा,

विद्यालय में वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में वक्ताओं ने बोलकर अपने विचार प्रकट किया तथा श्रोताओं में सुनकर उनका आनंदउठाया। यह भाषा का मौखिक रूप है। इसमें वक्त बोलकर अपनी बात करता है तब वह श्रोता सुनकर उसकी बात समझता है।

इस प्रकार भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति बोलकर विचार प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति सुनकर उसे समझना है वह मौखिक भाषा कहलाती है।

दूसरे शब्दों में जी आवाज का उच्चारण करके या बोलकर हम अपनी बात दूसरों को समझते हैं उसे मौखिक भाषा कहते हैं।

उदाहरण टेलीफोन दूरदर्शन भाषण वार्तालाप नाटक रेडियो यदि।

मौखिक या उच्चरित भाषा का बोलचाल का रूप है। उपचारित भाषा का इतिहास को मनुष्य के जन्म के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य ने जब से इस धरती पर जन्म लिया होगा तभी से उसने बोलना परम कर दिया होगा इसलिए यह कहा जाता है की भाषा मिल्लत मौखिक है।

यह भाषा का प्राचीनतम रूप है। मनुष्य में पहले बोलनाशिखा। इस ग्रुप का प्रयोग व्यापक स्तर पर होता है। मौखिक भाषा की कुछ विशेषताएं इस प्रकार है।

यह भाषा का अस्थाई रूप है। दूसरा उच्चरित होने के साथ ही या समाप्त हो जाती है। तीसरा वक्त और सोता एक दूसरे के आमने-सामने हो प्राइस तभी मौखिक भाषा का प्रयोग किया जा सकताहै।

चौथ किस रूप की आधारभूत इकाई ध्वनि है। विभिन्न झाइयों को संयोग से शब्द बनते हैं जिसका प्रयोग वक्त में तथा विभिन्न वाक्य का प्रयोग वार्तालाप में किया जाता है।

पांचवा या भाषा का मूल्य प्रधान रूप है।

दूसरा लिखित भाषा।

मुकेश छात्रावास में रहता है। उसने पत्र लिखकर अपने माता-पिता को अपनी कुशलता व आवश्यकताओं की जानकारी दी । माता ने पत्र पढ़कर जानकारी प्राप्त की। यह भाषा का लिखित रूप है। इसमें एक व्यक्ति लिखकर विचार या भाव प्रकट करता है तो दूसरा पढ़कर उसे समझना है। इस प्रकार भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति अपने विचार या मां के भाव लिखकर प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति पढ़कर उसकी बात समझता है वह लिखित भाषा कहलाती है।

दूसरे शब्दों में चिन्ह अक्षरों या कॉन की सहायता से हम अपने मां के विचारों को लिखकर प्रकट करते हैं उसे लिखित भाषा कहते हैं। उदाहरण

पत्र लेखन पत्रिका समाचार पत्र कहानी जीवनी संस्मरणता जाती।

उच्चरित भाषा की तुलना में लिखित भाषा का रूप बाद का है। मनुष्य को जब यह अनुभव हुआ होगा कि वह अपने मन की बात दूर बैठे व्यक्तियों तक या आगे आने वाली पीड़ित तक भी पहुंचा दे तो उसे लिखित भाषा की आवश्यकता हुई होगी। और मौखिक भाषा को स्थायित्व प्रदान करने हेतु उपचारित ध्वनि प्रति के लिए लिखित कॉन का विकास हुआ होगा। इस तरह विभिन्न भाषाभासी समुदायों ने अपनी अपनी भाषिक ध्वनियों के लिए तरह-तरह की आकृतिक वाले विभिन्न लिखित चीजों का निर्माण किया और इन्हीं लिखित कॉन को वर्ण लेटर कहा गया।

अतः जहां मौखिक भाषा के आधारभूत इकाई ध्वनि फार्म है तो वहां लिखित भाषा के आधारभूत इकाई वर्ण लेटर है।

लिखित भाषा की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है,

एक यह भाषा का स्थाई रूप है।

दूसरा इस रूप में हम अपने भाव और विचारों को अंतकाल के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।

तीसरा यह रूप यह अपेक्षा नहीं करता कि वक्त और स्वच्छताआमने-सामने हो।

चौथा इस रूप की आधारभूत इकाई वर्ण है जो उच्चरित ध्वनियों को अभिव्यक्त करते हैं।

फातिमा यह भाषा का गुण रूप है।

इस तरह यह बात हमेशा ध्यान में रखिए रखना चाहिए की भाषा का मुख्य रूप ही प्रधान या मूल्य रूप है। किसी व्यक्ति को यदि लिखना पढ़ना नहीं आता तो भी वह यह नहीं कह सकते हैं कि उसे वह भाषा नहीं आती है। किसी व्यक्ति को कोई भाषा आती है इसका अर्थ है उसे सुनकर समझ लेता है तथा बोलकर अपनी बात संप्रेषण कर लेता है।

सांकेतिक भाषा,

जींस संकेतों द्वारा बच्चों या गंज अपनी बात दूसरों को समझते हैं वह सब सांकेतिक भाषा कहलाती है। दूसरे शब्दों में जब संकेत इशारों द्वारा बात समझाइए और समझी जाती है तब वह संकेतिक भाषा कहलाती है। जैसे चौराहे पर खड़ा यातायात नियंत्रण करता सिपाही मुख्य बधिर व्यक्तियों का वार्तालापयदि। इसका अध्ययन व्याकरण में नहीं किया जाता है।

भाषा की प्राकृतिक,

भाषा सागर की तरह सदा चलती बहती रहती है। भाषा के अपने गुण या स्वभाव को भाषा की प्रकृति कहते हैं। हर भाषा की अपनी प्रकृति तांत्रिक कौन अवगुणहोते हैं। भाषा एक सामाजिक शक्ति है जो मनुष्य को प्राप्त होतीहै। मनुष्य से अपने पूर्वजों से सीखना है और उसका विकास करता है।

यह परंपरागत और अर्जित दोनोंहै। जीवंत भाषा बताने की तरह सदा प्रभावित होती रहतीहै। भाषा के दो रूप है कथित औरलिखित। हम इसका प्रयोग कथन के द्वारा अर्थात बोलकर और लिखकर लेखन के द्वारा करते हैं। देश और कल के अनुसार भाषा अनेक रूपों में बाटी है। यही व्याकरण है कि संसार में अनेक भाषाएं प्रचलितहै। भाषा वाक्य से बनती है वाक्य शब्द से और शब्द मूल्य ध्वनियों से बनते हैं। इस तरह वाक्य शब्द मुल्तानी ही भाषा के अंग है। व्याकरण में इन्हीं के अंग प्रयोग का अध्ययन विवेचन होताहै। व्याकरण भाषा पर आश्रित है।

भाषा के विभिन्न रूप,

हर देश में भाषा के तीन रूप मिलते हैं। एक बोलियां दूसरी स्थिति भाषा तीसरी राष्ट्रभाषा।

एक बोलियां, जिन स्थानीय बोलियों का प्रयोग साधारण अपने समूह या घरों में करती है उसे बोली डायरेक्ट कहते हैं किसी भी देश में बालियां की संख्या अनेक होती है। यह खास बात की तरह अपने आप जन्म देती है और किसी क्षेत्र विशेष में बोली जाती है। जैसे भोजपुरी मकई अवधि मराठी तेलुगू इंग्लिश यदि। दूसरी पर निश्चित भाषा।

यह व्याकरण में नियंत्रित होती है इसका प्रयोग शिक्षा शासन और साहित्य में होता है। बोली को जब व्याकरण से पर निश्चित किया जाता है तब वह परिनिष्ठित भाषा बन जाती है। खड़ी बोली कभी बोली थी आज परिनिश भाषा बन गई है जिसका उपयोग भारत में सभी स्थानों पर होता है।

जब भाषा व्यापक शक्ति ग्रहण कर लेती है तब आगे चलकर राजनीतिक और सामाजिक शक्ति के आधार पर राजभाषा या राष्ट्रभाषा का स्थान का लेती है। ऐसी भाषा सभी सीमाओं को लाख कर अधिक व्यापक और विस्तृत क्षेत्र में विचार विनियम का साधन बनकर सारे देश की भावनात्मक एकता में सहायक होती है। भारत में 15 विकसित भाषाएं हैं पर हमारे देश के राष्ट्रीय नेताओं ने हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा राज्य भाषा का गौरव प्रदान किया है। एक प्रकार हर देश की अपनी राजभाषा रूस की रूसी फ्रांस की फ्रांसीसी जर्मनी की जर्मन जापान की जापानीजाति।

तीसरा राष्ट्रभाषा,

राष्ट्रभाषा जब कोई भाषा किसी राष्ट्र के अधिकांश प्रदेशों के बहुमत द्वारा बोली वह समझी जाती है तो वह राष्ट्रभाषा बनजाती है। दूसरे शब्दों में वह भाषा जो देश के अधिकतर निवासियों द्वारा प्रयोग में लाई जाती है राष्ट्रभाषाकहलाती है।

सभी देशों की अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा होती है। अमेरिका अंग्रेजी चीनी चीनी जापानी जापानी रस रूस ऋषि आदि। भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है या लगभग 70 75% लोगों द्वारा प्रयोग में लाई जाती है। भाषा और लिपि,

भाषा

लिपि शब्द का अर्थ है लिखना या पोतना विचारों का लिखना अथवा लिखना ही लिपिकहलाती है। दूसरे शब्दों में भाषा की उच्चरित मौखिक ध्वनियों को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने के लिए निश्चित किया गया है इंजन है या वर्णों की व्यवस्था को लिपि कहते हैं। हिंदी और संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है। अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन है पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी है और उर्दू भाषा की लिपि फारसी है।

मौखिक या उचित भाषा को स्थापित प्रदान करने के लिए भाषा के लिखित रूप का विकासहुआ। प्रत्येक उच्चरित धोनी के लिए लिखित चिह्न या वर्ण बनाए गए हैं वर्णों की पूरी व्यवस्था को ही लिपि कहा जाता है। वस्तुत लिपि उच्चरित होने को लिखकर व्यक्त करने का एकढंग है। सविता के विकास के साथ-साथ अपने भावों को विचारों को स्थापित प्रदान करने के लिए दर-दर स्थिर लोगों से संपर्क बनाए रखने के लिए तथा संदेशों को समाचारों के आदान-प्रदान के लिए जब मौखिक भाषा से कामना चल पाया होगा तब मौखिक ध्वनि संकेत प्रति को लिखित रूप देने की आवश्यकता अनुभव हुई होगी यही आवश्यकता लिपि के विकास का कारण बनीहोगी। अनेक लिपियां किसी भी भाषा को एक से अधिक लिखिए में लिखा जा सकता है। तो दूसरी और कई भाषाओं को एक ही लिपि में लिख सकते हैं अर्थात एक से अधिक भाषाओं का किसी एक लिपि में लिखा जा सकता है उदाहरण के लिए हिंदी भाषा को हम देवनागरी तथा रोमन दोनों लिपियों में इस प्रकार लिख सकते हैं। देवनागरी लिपि, मेरा घर गई है, रोमन लिपि, Mira ghar hai,इसके विपरीत हिंदी मराठी नेपाली बोलो तथा संस्कृत भाषण देवनागरी लिपि में लिखी जाती है उसका नाम देवनागरीलिपि है। देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मण एक लिपि से हुआ है , ब्रह्मी व प्राचीन लिपि है जिससे हिंदी देवनागरी का ही नहीं गुजराती बांग्ला असमिया गुड़िया आदि भाषाओं का भी विकास हुआ है।

। देवनागरी लिपि को लेकर कल मिलेंगे दोस्तों तब तक के लिए नमस्कार जय हिंद जय भारत। आज के लिए इतना ही काफी है,