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मेरे दिल की बात




























भारतवर्ष की भौगोलिक पृष्ठभूमि हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक विस्तृत भूभाग को अति प्राचीन काल से भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार दुष्यंत के पुत्र भारत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। कुछ विद्वानों के अनुसार रिस्क भागदेव के जस्ट पुत्र भारत के नाम पर यह देश भारतवर्ष कहलाया। ईरानियन ने इस देश को हिंदुस्तान का कर संबोधित किया और यूनिनॉर्नियों ने किस इंडिया का कर पुकारा। प्राचीन साहित्य में भारत देश को भारत भूमि की संज्ञा दी गई है। इस जन्म बुद्धि का एक भाग माना जाता है। भारत को चतुर्थ स्थान संस्कृत कहा गया है। हिंदू शब्द भी महान सिंधु नदी से निकला है।
भू आकृति
किसी भी देश की भौगोलिक स्थिति का उसके इतिहास पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक बनावट जलवायु भूमि की पूर्व खनिज शक्ति आदि किसी भी देश की राजनीतिक घटनाओं समाज धर्म एवं व्यवस्था को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। भारतीय इतिहास भी इसका अपवाद नहीं है। हमारे देश की भौगोलिक स्थिति ने भी इसके इतिहास पर अपना अमित प्रभाव छोड़ा है। भारतीय इतिहास को समझने के पूर्व इसके भौगोलिक बनावट का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।
विभाजन के पूर्व भारत एक विशाल देश था जिसमें रस को छोड़कर संपूर्ण यूरोप समा सकता था। इसकी विशाल ता के कारण ही कई इतिहासकारों ने इसे उपमहाद्वीप कहां है। इसकी विशेषता का इसके इतिहास पर काफी प्रभाव पड़ा है। इसके प्राकृतिक और सामाजिक परिस्थितियों की विविधता उत्पन्न हुई जिसके कारण भारत एक लघु विश्व के रूप में परिवर्तित हो गया है।
उत्तर में हिमालय पर्वत भारतवर्ष का मुकुट है तो दक्षिण में महासागर इसका पद पर्सनल करता है। भारत तीन दिशाओं पूर्व पश्चिम और दक्षिण में समुद्र से घिरा हुआ है। उत्तरी पर्वतों की भयंकर दुर्घट और दक्षिण के समुद्रों के कारण भारत देश शेष विश्व से पृथक सा रहा। पूर्व में पद कोई लोग और लुगाई की पहाड़ियों और अनेक घने जंगलों ने आवागमन को दुरुहबना दिया है।
भौगोलिक अध्ययन
भारत के उत्तर में पूर्व से पश्चिम तक हिमालय एवं अन्य पर्वत श्रेणियां फैली हुई है जिसके अंतर्गत कश्मीर कंगना गढ़वाल भूमियों नेपाल सिक किम तथा भूटान जैसे पर्वतीय क्षेत्र है। इसके साथ-साथ विशाल हिमालय पर्वत अफगानिस्तान से असम तक विस्तृत दीवार के सामान फैला हुआ है। इसके लंबाई 1600 मिल है। संसार की कुछ प्रसिद्ध चोटिया जैसे एवरेस्ट गैरिसन का कन्यादान यदि इसी सेनिश रंग में है।
उत्तर का मैदान
उत्तर का विस्तृत मैदान जिसमें सिंधु और इसकी सहायक नदियों की तरैयां एवं गंगा यमुना और ब्राह्मण पुत्र से सिंचित उपजाऊ विभाग सम्मिलित है। यहां संसार के अधिकतम उपजाऊ प्रदेशों में से है।
दक्षिणी पठार
दक्षिणी में विंध्य पर्वत के पूर्वी अंश में नर्मदा के स्रोतों के पास से फटकार एक शृंगार नर्मदा के बाएं दाएं चली गई है। ताप्ती और महानदी के दक्षिण समुद्र की ओर बढ़ता हुआ त्रिकोण पत्थर डेकानया दक्षिणी कहलाता है।।
समुद्र तटीय प्रदेश
इस तिकोना के पश्चिमी किनारे को पश्चिमी घाट और पूर्वी किनारे को महेंद्र पर्वत या पूर्वी घाट कहते हैं। पश्चिमी घाट के केरल या मालाबार करते हैं। पूर्वी घाट के दक्षिणी भाग को कोरोमंडल सौरमंडल और प्रतिभा को काली कहते हैं। दक्षिणी का पत्थर कृष्णा नदी द्वारा दो भागों में बंटा हुआ है। उत्तरी हिस्सों का पश्चिमी भाग महाराष्ट्र और पूर्वी भाग आंध्र कहलाता है। परंतु यह प्रादेशिक विभाजन प्राचीन अनुसूचित अथवा प्राचीन साहित्य में वर्णित विभाजन से मिल नहीं खाते। भारत के प्राचीन साहित्य में भारत के पांच भागों में बंटे होने के उल्लेख मिलता है। सिंधु और गंगा के मध्य मध्य प्रदेश था। ब्राह्मण ग के अनुसार यह भाग सरस्वती नदी के प्रज्ञा का शीर्षक और बौद्ध ग्रंथ के अनुसार राजमहल तक फैला हुआ था। इसी क्षेत्र का पश्चिमी भाग ब्रह्महर्षी 10 देश कहलाता था। पतंजलि ने इस संग्रह विभाग से आर्यावर्त कहा है। समृद्धि या में आर्यावर्त को हिमालय और विंध्य पर्वत के मध्य में बतलाया गया है। पौराणिक ग के अनुसार मध्य प्रदेश के उत्तर में उतरापट या उद्देश्य इसके पश्चिम में अपरांत या प्रतिच्या इसके दक्षिण में दक्षिण पाठ या दक्कन और इसके पूर्व में पूर्व देश या परिचय था। उत्तर पाठ कभी-कभी संपूर्ण उत्तर भारत के लिए और दक्षिण पद ढक्कन के भूभाग के लिए व्यवस्था हृदय किया जाता था। सुदूर दक्षिण में तमिल देश था । इस प्रकार कहा जा सकता है की भौगोलिक दृष्टि से कश्मीर से लंका की सीमा तक और कश्मीर से असम तक संपूर्ण भू भाग सही अर्थ में भारतवर्ष था जिसका वर्णन हमें पुराने ग से मिलता है।
आवागमन के प्रमुख मार्ग
तीन और से समुद्र से गिरा होने के कारण भारत के लोग अति प्राचीन काल से ही सामुद्रिक मार्ग से पूर्णतया परिचित है और सामुद्रिक या नवरात्र में काफी बड़े हुए थे। भारत का व्यापार अफ्रीका अरब ईरान हिंद चीन हा यदि देश से होता था। रूम के साथ तो इसके काफी दिनों तक व्यापारिक संबंध बन रहे।
इस प्रकार विस्तृत समुद्र के कारण पूर्वी और पश्चिमी देशों से पर्याप्त मात्रा से व्यापार होता था।
अपनी प्राकृतिक बनावट के कारण भारत से विश्व के देशों से बिल्कुल अलग था।
प्राचीन काल में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत से भारत पर आक्रमण होता था क्योंकि उधर ही बोलन और खबर के दर्रे थे जो अब पाकिस्तान में है। आर्यों के समय से मध्यकाल तक इसी रास्ते से भारत पर आक्रमण होते रहे हैं। 1498 में वास्कोडिगामा के नेतृत्व में सर्वप्रथम पुर्तगालियों का आगमन समुद्र के रास्ते पूर्वी तट पर हुआ और बाद में उसी रास्ते से डक फ्रांसीसी और अंग्रेज आए।
प्राचीन भारत में कटी पर ऐसे राजमार्ग भी थे जिनका व्यापारिक एवं संस्कृत महत्व था। एक प्रधान राजमार्ग हुआ था जो सिंधु नदी के पश्चिम से चलकर पंजाब की नदियों को लंका हुआ कुरुक्षेत्र से होकर गंगा तक जाता था और फिर वाराणसी के पास गंगा के दाहिने किनारे से बंगाल के बंदरगाहों तक जाता था। उसे मार्ग के दो वह और बड़े नेक थे एक तो सिंधु और झेलना नदी के बीच और दूसरा बिहार बंगाल की सीमा पर मुंगेर से राजमहल तक। हिमालय से नीचे अवध से असम तक एक अलग मार्ग था और उधर हिमालय से पर जाने वाले सीमांत मार्ग भीथे। कश्मीर से असम तक प्रत्येक प्रदेश में से हिमालय के घाटों पर चढ़कर तिब्बत में उतरने वाले अनेक रास्ते थे। विंध्य पर्वत को लंगकर दक्षिण जाने का रास्ता था। मालवा से एक मार्ग पश्चिम तट के बंदरगाहों तक जाता था। प्रयाग से भी दक्षिण जाने का मार्ग था। नदियों के मार्ग से भी लोग यात्रा करते थे नदियों के किनारे बड़े-बड़े नगरों का विकास हुआ। आवागमन के इस सुविधा ने विषम प्राकृतिक बनावट वाले भारतवर्ष की एकता को जीवित रखा।
वातावरण
भौगोलिक विधि विभिन्नताओं के बावजूद भारतवर्ष एक संपूर्ण देश रहा है। भारत की मौलिक एकता यहां की विभिन्नताओं में निहित है। विभिन्न जातियों द्वारा विकसित एवं प्रतिपादित सभ्यता पर आधारित भारत की एक यह मौलिक एकता संसार में आदित्य है। प्रेम और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व पर यहां की एकता कायमहै। प्राकृतिक ने इसकी भौगोलिक इकाई को इस दृढ़ता से बनाया है कि यह देश के आंतरिक विभाजनों को अच्छी तरह ढंकदेती है। विष्णु पुराण में इसकी एकता इस प्रकार वर्णित है समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो देश है वह भारत नाम का खंड कहलाता है और वहां के लोग भारत की संतान कहलाते हैं। आध्यात्मिक पंडितों राजनेताओं तथा कवियों और साहित्यकारों के मानस में एकता की यह भावना सर्वदा विद्वान थी। हिमालय से लेकर समुद्र तक विस्तृत योजन भूमि को एक ही सार्वभौम सम्राट का राज होने योग्य कहा गया है। प्राचीन ग्रंथो में ऐसे अनेक शासको का उल्लेख मिलता है जिन्होंने भारत के विभिन्न प्रदेशों को एक सूत्र में बांधने की चेष्टा की। भारत की भौगोलिक एकता इसके सांस्कृतिक जीवन से परिलक्षित होती है। भारत और भारतीय संस्कृत में वही संबंध है जो आत्मा और शरीर में है। प्राकृतिक और भौगोलिक विशेषताओं ऐतिहासिक अनुभव धार्मिक विचारों और राजनीतिक आदर्श के कारण भारतवर्ष में एकता के भाव का विकास हुआ और इन्हीं कर्म से यह स्थिर और फिरता और होता गया। समस्त विभागों के बीच हिमालय से लेकर कन्याकुमारी अंतरिक्ष तक एकता की धारा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। भारतीय इतिहास की सर्वश्रेष्ठ विशेषता है इसकी विविधता मेंएकता।
उपर्युक्त एकता स्थापित करने में अनेक साधनों का योगदान रहा है। सर्वप्रथम ऋषि मुनि संत धर्म प्रचारक यात्रियों एवं विद्यार्थियों ने इस एकता को बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया। ऋषि मुनियों ने विभिन्न स्थानों पर आश्रम एवं स्थापित किया। इन स्थलों में हिंदू संस्कृति एवं सभ्यता का पाठ पढ़ाया गया। शंकराचार्य चेतन या और नानक यदि संतों ने अपने भ्रमण एवं प्रवचन से सांस्कृतिक एकता में वृद्धि की। काशी मथुरा यदि तीर्थ स्थलों एवं तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय में भी देश को सांस्कृतिक एकता प्रदान की।
चंद्रगुप्त मौर्य अशोक समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त विक्रमादित्य आदि सम्राटों ने अपने दिग्गज में तथा एक साथ समान शासन पद्वित से भी देश की एकता को भीड़ दिया। प्राचीन काल में संस्कृत पाली एवं प्राकृतिक तथा आधुनिक युग में अंग्रेजी और हिंदी ने भी भौगोलिक एकता उत्पन्न की।। इसी प्रकार विभिन्न संप्रदायों एवं धर्म के मूल स्रोतों हिंदू धर्म में भी अपने पर सर से एकता की प्रवृत्ति को पृष्ठ किया है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारत में अनेक विभिन्नताओं के बावजूद भौगोलिक संस्कृत राजनीतिक और भाषिक एकता विद्यमान है। हर्बर्ट बिजली के शब्दों में भारत में धर्म रीति रिवाज भाषा तथा सामाजिक एवं शारीरिक विभिन्नताओं के होते हुए भी जीवन की एक विशेष एकरूपता कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक देखी जा सकती है। वास्तव में भारत एक अलग चरित्र तथा व्यक्तित्व है जिसको लग नहीं किया जा सकता।
निवास
भारत का वर्तमान जातीय स्वरूप किस्म की प्रमुख जातियों के समीकरण का प्रतिफल है। यह जातियां हैं रावण को और कोचिंग के नीग्रो व्हाइट आदिवासी आदम निषाद ऑस्ट्रेलिया और असम के कीरत मंगलौर हु मेड थिस अग्नि जातियां काठियावाड़ तमिलनाडु और गुजरात की चौड़ी शिखा वाली वैकेंसी पहले जातियां बंगाल और उड़ीसा की दिनार जातियां एवं पंजाब राजस्थान महाराष्ट्र तथा बंगाल की आर्य मौद्रिक आज़ादियां यहां की जातियों को चार भागों में बांटा जा सकता है।
एक आर्य जाति यह लोग लंबे और गोरे चौड़े ललाट वाले होते हैं यह भारत के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं। दूसरा द्रविड़ जाती दक्षिण में द्रविड़ जाति की प्रधानता है कटी पर विद्वानों के अनुसार दलवी लोग ही भारत के आदि निवासी हैं यह नाटक कद चुपके नाक और काले रंग के होते हैं। तीसरा पहाड़ी जातियां यह लोग पहाड़ की तलहटी और जंगलों में रहते हैं इसकी नाक चौड़ी और चपटी होती है कॉल बिल इसी जाति के अंतर्गत आते हैं। चौथा मंगल जाती इनका रंग पीला होता है बरखा भोटिया और शक जाति के लोग इसी के अंतर्गत आते हैं यह लोग हिमालय के निकट रहते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में कीरत हूं या वंशक पहलव यदि जातियां भी निवास करती थी। बाद में आने जातियां भी भारत में आई और यही बस गई यह लोग भारत के निवासियों में से इतना अधिक भूल मिल गए कि यह भारत की विभिन्न जातियों में तुरंत ही विलीन हो गए और इनका अपना अस्तित्व तुरंत तेज समाप्त हो गया। भाषाएं, आदि निषाद जाति की देन निषाद भाषा है जिसे मुंडा कहते हैं मुंडा यह कोलरी एक विशिष्ट आदेश आदम सभ्यता तथा श्रृंखला परगना छोटा नागपुर मध्य प्रदेश उड़ीसा तथा तमिलनाडु प्रदेश के कुछ भागों में प्रचलित है। किरतु मांगो लाइट से भारत ने दो भाषण ग्रहण की है, एक टिप्पणी वर्मी जिसे असम के मिश्रण लोग पर्वतों के काकी चीन कुछ बर नागौर और असम के अन्य प्रदेशों के कोच अथवा बोडो बोलते हैं। दूसरा मून खमीरमैंगो
जो असम में खास नमक पहाड़ियों पर बोली जाती है भूमध्य सागरीय और अल्पिनी आर्मी मिनी लोग भारत में द्रव्य भाषण और अपनी सभ्यताएं लाए। नॉर्डिक लोग भारत में अपनी आर्य भाषा लेकर आए कहा जाता है कि भारत में 179 भाषण और 545बोलियां है। परंतु साहित्य की दृष्टि से भारत में महत्वपूर्ण भाषण की संख्या 17 है जिन में तेलुगू तमिल कन्नड़ और मलाई डार्विन परिवार की भाषणहै। अरे भाषाओं में हिंदी गुजराती सिंधी कश्मीरी मैथिली आसामी उड़िया और बंगाली प्रमुख है। तीसरी शताब्दी की पूर्व तक विशाल भारत में पाली भाषा का राज था जिन में अशोक केसंदेशों को
जनसाधारण तक पहुंचने में सफलता पाई इसके पश्चात संस्कृत भाषा का प्रसार हुआ और यह भारत के अधिकांश भागों में बोली एवं समझी जातीरही। महाकवि अश्वघोष कालिदास वनवास भट्टी तथा हरी शेष यदि की रचनाएं संस्कृत भाषा में उल्लेखनीय है। आर्यभट्ट बड़ा मिनी ही ब्रह्म गुप्त तथा भाषिक प्राचार्य ने भी इसी भाषा में अपने ज्योतिष ग की रचना की इनकी अतिरिक्त प्राचीन राज नैतिक शास्त्र धर्मशास्त्र दर्शनशास्त्र नीति शास्त्र विधि शास्त्र तथा व्याकरण यदि के संख्या ग्रंथ इसी भाषा में लिखी गई। रामायण और महाभारत भी संस्कृत में ही लिखे गए जो तमिल तथा कन्नड़ प्रदेशों में भी उतनी ही श्रद्धा भक्ति के साथ पढ़े जाते हैं जितनी उतरी भारत में इस प्रकार प्राचीन भारत में देश के समस्त विश्व समाज को एकता के सूत्र में बांधने का जो कार्य संस्कृति पाली प्राकृतिक आदि ने किया आज वही कार्य हिंदी कर रही है। फिर फिर मिल कल मिलेंगे दूसरे चैप्टर लेकर के प्राचीन भारत इतिहास के स्रोत एवं उपागम पर्यावरण ओपन।
























अंत का अर्थ होता है भीतर उच्चारण के समय जो व्यंजन मुंह के भीतर ही रहे उन्हें अंतस्थ व्यंजन कहते हैं। अंत मध्य बीच अस्त स्थित इन व्यंजनों का उच्चारण स्वर तथा व्यंजन के माध्यम से होता है उच्चारण के समय जीव मुख के किसी भाग को स्पर्श नहीं करती यह व्यंजन चार होते हैं या अल्लाह इनका उच्चारण जीव तालू दांत और होठों के ऊपर सताने से होता है किंतु कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता तथा यह चारों अंतस्थ व्यंजन कहलाती है।
तीसरा उसका व्यंजन।
उष्म व्यंजन का अर्थ होता है गम जीव वर्णों के उच्चारण के समय हवा मुख के विभिन्न भागों से तकरार और सांस में गर्मी पैदा कर दे उन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं। उसमें गम इन व्यंजनों के उच्चारण के समय आयु मुख से रगड़ खाकर उसका पैदा करती है यानी उच्चारण के समय मुख से कम हवा निकलती है ऊष्म व्यंजन का उच्चारण एक प्रकार की रागनी या घर्षण से उत्पन्न उसे मोबाइल से होता है यह भी कर व्यंजन होते हैं तालिबान समुदान साधन सा ह।
उच्चारण स्थान के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण व्यंजनों का उच्चारण करते समय हवा मुख के अलग-अलग भागों से टकराती है। उच्चारण के अंगों के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण इस प्रकार है,
कंठ गले से का ख ग घ अंग
पोस्ट दोनों होठों से प फ ब म
दंतुष्ठ निकले वोट वी ऊपरी दातों से व फ,
स्वर यंत्र से, ह,
समास प्राण आयु की मात्रा के आधार पर वर्ग भेद उच्चारण में वायु प्रक्षेप की दृष्टि से व्यंजनों के भेद हैं एक अल्पप्राण दूसरा महापुराण।
एक अल्प्राण
जिनके उच्चारण में श्वास पूर्व से अल्प मात्रा में निकले और जिनके जाकर जैसी ध्वनि नहीं होती उन्हें अल्पप्राण कहते हैं। सरल शब्दों में जिन वर्णों के उच्चारण में वायु की मात्रा कम होती है वह अल्प्राणकहलाते हैं। प्रत्येक वर्ग का पहला तीसरा और पांचवा वर्ग अल्प्राणव्यंजन है।
जैसे, क , ग, अंग, ज, ट,न, त, द, न, ब, म, अंत् अस्त-य, र, ल, व,। भी अल्पप्राण ही है।
दूसरा महाप्राण, जिनके उच्चारण में आकर जैसी ध्वनि विशेष रूप से रहती है और स्वास्थ्य अधिक मात्रा में निकलती है उन्हें महाप्राण कहते हैं सरल शब्दों में जिन वर्णों के उच्चारण में वायु की मात्रा अधिक होती है वह महापुराण कहलाते हैं।
प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण तथा समस्त ऊष्म वर्ण महापुराण है। जैसे,
ख, घ, छ, झ, ट, ढ, थ, ध, फ, भ, ओर श, स ह,।
संक्षेप में अल्पप्राण वर्णों की अपेक्षा महापुराण में प्राण वायु का उपयोग अधिक शर्म पूर्ण करना पड़ता है। यह संख्या में चार है।
क्ष, त्र, गान्य, सरा,
संयुक्त व्यंजन में पहला व्यंजन स्वर्ग रहित तथा दूसरा व्यंजन स्वर सहित होता है।
दूध व्यंजन, वित्त व्यंजन का अपने एक समरूप व्यंजन से मेल होता है तब वह विद्युत व्यंजन कहलाती है।
जैसे, पक्का कच्चा चम्मच पत्ता,
द्वित्व व्यंजन में भी पहले व्यंजन स्वर रहित तथा दूसरा व्यंजन स्वर सहित होता है।
संयुक्त अक्षर, जब एक सवाल रहित व्यंजन अन्य स्वर्ण सहित व्यंजन से मिलता है तब वह संयुक्ताक्षर कहलाते हैं।
जैसे , संयुक्त स्थान संवाद,
यहां तो अलग-अलग व्यंजन मिलकर कोई नया व्यंजन नहीं बनते हैं।
वर्णों की मात्राएं,
व्यंजन वर्णों के उच्चारण में चिन्ह स्वर्मूलक कॉन का व्यवहार होता है उन्हें मात्राएं कहते हैं।
दूसरे शब्दों में स्वरों के व्यंजनों में मिलने के इन रूपों को भी मात्र कहते हैं क्योंकि मात्राएं तो सवारों की होतीहै। यह मात्राएं 10 है। जैसे आर ए ई ओ इत्यादि। यह माताएं केवल व्यंजनों में लगती है कामिकार का काम हमसे की कमी दुर्गा की कमी अशोक को कामदुर्गा को री के के को को इत्यादि। स्वर वर्णों की ही हषर्वउद्दीन गांव चांद में लघु गुरु मात्राएं होती है जो व्यंजनों में लगने पर उनकी मात्राएं हो जाती है हां व्यंजनों में लगने पर सवार संयुक्त छह ₹10 के हो जाते हैं।
घोष और आज घोष व्यंजन,
एक ठोस व्यंजन नाद की दृष्टि से जिन व्यंजनों वर्णों के उच्चारण में स्वतंत्रता झंकृत होती है वह घोष कहलाते हैं।
दूसरा आगोश व्यंजन, नाद की दृष्टि से जिन व्यंजन वर्णों के उच्चारण में सवार तांत्रिक जकित नहीं होती है वह आगोश कहलाते हैं। होश में केवल नाथ का उपयोग होता है जबकि आगोश में केवल श्वास का। उदाहरण के लिए आगोश वर्ण क, ख, च, छ, ट, थ, ता, प, फ, स, श,। घोष वर्ण प्रत्येक वर्ग का तीसरा चौथा और पांचवा वर्ण सारे स्वर वर्ण , य, र, ल, व, ह,।
हल, हाल व्यंजनों के नीचे जब एक तिरछी रेखा लगाई जाए तब उसे हल करते हैं हाल लगाने का अर्थ है कि व्यंजन में स्वर वर्ण का बिल्कुल अभाव है या व्यंजन आधा है। जैसे
व्यंजन वर्ण है इसमें, अ, स्वर वर्ण की ध्वनि छपी है।
यदि हम इस ध्वनि को बिल्कुल अलग कर देना चाहे तो के में हालांकि या हाल चिन्ह लगाना आवश्यक होगा ऐसी स्थिति में इसके रूप इस प्रकार होंगे आधा का आधा का आधा का अच्छा।
हिंदी के नए वर्ण हिंदी वर्णमाला में पांच नए व्यंजन। छ,tra, गया, ड, और ढ, जोड़े गए हैं किंतु इनके प्रथम तीन स्वतंत्र ना होकर संयुक्त व्यंजन है जिनका फंड किया जा सकता है।
और उनके गिनती स्वतंत्र वर्णों में नहीं होती है और नीचे बिंदु लगाकर दो नए अक्षर बनाए गए हैं संयुक्त व्यंजन है।
यहां दादा में रखी धोनी मिली है इनका उच्चारण साधारण में लगने से भी में उच्चारण होते हैं हिंदी में अरबी खांसी की धनिया को भी अपने की चेष्टा है व्यंजनों के नीचे बिंदु लगाकर इन नहीं विदेशी स्थानों को बनाए रखने की चेष्टा की गई है। जैसे कलम खैर जरूर किंतु हिंदी में फारसी अरबी से आए शब्दों के नीचे बिंदु लगाए बिना इस शब्दों को अपनी भाषा की प्रकृति की अनूप रूप के लिखा जाना चाहिए। बांग्ला और मराठी में भी ऐसा ही होता है। वर्णों का उच्चारण कोई भी वर्ण मुंह के विभिन्न भिन्न-भिन्न भागों से बोला जाता है इन्हें उच्चारण स्थान कहते हैं। मुख के छह भाग है कंठ तालु मुर्दा दांत होता और नाक हिंदी के सभी वर्ण इन्हीं से अनुशासित और उच्चरित होते हैं क्योंकि उच्चारण स्थान भिन्न है इसलिए वर्णों की निमित्त लिखित श्रेणी बन गई है, कंठी कंठ और निकली जीव के स्पर्श से बोले जाने वाले वार्न और एमित्र का वर्ग था और:। तलवे तालु और जब के स्पर्श से बोले जाने वाले वार्न हर सही दुर्गे चावल या और तालिब्रेशन।
कंट्री कंठ और तालू में जीव के स्पर्श से बोले जाने वाले वार्न ए आए। स्वर वर्णों का उच्चारण ए का उच्चारण या कांत ध्वनि है इसमें व्यंजन मिला रहता है जैसे का और जब या किसी व्यंजन में नहीं रहता तब उसे व्यंजन के नीचे हाल का चिन्ह लगा दिया जाता है हिंदी के प्रत्येक शब्द के अंतिम लगे वर्ण का उच्चारण हालांकि से होता है जैसे नमक रात दिन मन हो पुस्तक किस्मत इत्यादि इसके अतिरिक्त यदि आकारांत शब्द का अंतिम वन संयुक्त हो तो अत्यंत का उच्चारण पूरा होता है जैसे सत्य ब्राह्मण खंड धर्मइत्यादि। इतना ही नहीं यदि हर सही गुरुदेव या यू के बाद या और तो अत्यंत का उच्चारण पूरा होता है जैसे प्रिय आत्मिक राज सूर्य आदि ए और और का उच्चारण ए का उच्चारण कंठ और तालू से औरों का उच्चारण कंठ और वोट के स्पर्श से होता है संस्कृत की अपेक्षा हिंदी में इनका उच्चारण भिन्न होता है जहां संस्कृत में एक का उच्चारण आई और तो का उच्चारण आओ की तरह होता है वहां हिंदी में इनका उच्चारणकर्म
























