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सर्वनाम की परिभाषा जिन शब्दों का प्रयोग संज्ञा के स्थान पर किया जाता है उन्हें सर्वनाम कहते हैं। दूसरे शब्दों में सर्वनाम उसे विकारी शब्द को कहते हैं जो पर्व पर संबंध से किसी भी संज्ञा के बदले आते हैं।
सरल शब्दों में सर्व सब नाम संख्याओं के बदले जो शब्द आते हैं उन्हें सर्वनाम कहते हैं। सर्वनाम यानी सब के लिए नाम। इसका प्रयोग संज्ञा के स्थान पर किया जाता है। लिए देखें कैसे राधा साथ में कक्षा में पढ़ती है। वह पढ़ाई में बहुत तेज। उसके सभी मित्र उसे प्रसन्न रहते हैं। वह कभी भी स्वयं पर घमंड नहीं करती। वह अपने माता-पिता का आदरकरती है। आपने देखा कि ऊपर लिखे अनुच्छेद में राधा के स्थान पर वह उसके उसे स्वयं अपने आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। अच्छा यह सभी शब्द सर्वनाम है।
इस प्रकार संख्या के स्थान पर आने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं।
मैं तो वह आप कोई यह भी हम इसे उसे किस जिसे तुम कुछ कौन क्या जो सो उसका उन्होंने उसने किसने जिसे जिसे सबने यहां वहां जहां कहां-कहां अपने ही स्वयं उसे इसके जिससे किस हमारा तुम्हारा मैंने मुझे तेरा मेरा वह उन्होंने कैसे ऐसे वैसे-वैसे सबसे आप लोग हम लोग हम लोग वह लोग आदि सर्वनाम शब्द है। अन्य सर्वनाम शब्द भी इन्हीं शब्दों से बने हैं जो लिंग वचन कारक की दृष्टि से अपना रूप बदलते हैं।
जैसे राधा नृत्य करती है। राधा का गाना भी अच्छा होता है। राधा गरीबों की मदद करती है। राधा नृत्य करती है उसका गाना भी अच्छा होता है वह गरीबों की मदद करती है आप अपना या इस इसका वह उसेउसका। अन्य उदाहरण
एक सुभाष एक विद्यार्थीहै। वह रोज स्कूल जाता है। उसके पास सुंदर बसता। उसे घूमना बहुत पसंद है। उपर्युक्त वाक्य में सुभाष शब्द संज्ञा है तथा इसके स्थान पर वह उसके उसे शब्द संज्ञा सुभाष के स्थान पर प्रयोग किए गए हैं। इसलिए यह सर्वनाम है।
संज्ञा की अपेक्षा सर्वनाम की विलक्षणता यह क्या है की संख्या से जहां इस वस्तु का बोध होता है जिसका वह संज्ञा नाम है वहां सर्वनाम में पूर्वक पर संबंध के अनुसार किसी भी वस्तु का बोध होता है। लड़का खाने से केवल लड़की का बोध होता है घर सड़क आदि का बोध नहीं होता किंतु वह कहने से पूर्व पर संबंध के अनुसार ही किसी वस्तु का बोध होता है।
सर्वनाम के भेद, सर्वनाम के 6 भेद होते हैं,
एक पुरुषवाचक सर्वनाम, दूसरा निश्चयवाचक सर्वनाम, तीसरा अनिश्चयवाचकसर्वनाम, चौथा संबंधवाचक सर्वनाम, पांचवा प्रश्न वाचक सर्वनाम, छठ निजवाचक सर्वनाम,
एक पुरुषवाचक सर्वनाम, जिन सर्वनाम शब्दों से व्यक्ति का बोध होता है उन्हें पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। दूसरे शब्दों में बोलने वाले सुनने वाले तथा इसके विषय में बात होती है उनके लिए प्रयोग किए जाने वाले सर्वनाम पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। पुरुषवाचक सर्वनाम पुरुषों स्त्री या पुरुष के नाम के बदले आते हैं।
जैसे मैं आता हूं। तुम जाते हो। वह भगत। उपर्युक्त वाक्य में मैं तुम वह पुरुषवाचक सर्वनाम है। पुरुषवाचक सर्वनाम के प्रकार, पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते हैं, एक उत्तम पुरुष दूसरा मध्यम पुरुष तीसरा अन्य पुरुष,
एक उत्तम पुरुष जिन सर्वनाम का प्रयोग बोलने वाला अपने लिए करता है उन्हें उत्तम पुरुष करते हैं। जैसे मैं हमारा हम मुझको हमारी मैंने मुझे आदि।
उदाहरण मैं स्कूल जाऊंगा। हम मतदान नहीं करेंगे। यह कविता मैंने लिखीहै। बारिश में हमारी पुस्तक भीग गई। मैंने उसे धोखा नहीं दिया है।
दूसरा मध्यम पुरुष, जिन सर्वनाम का प्रयोग सुनने वाले के लिए किया जाता है उन्हें मध्यम पुरुषकहते हैं। जैसे तू तुम तुम्हें आप तुम्हारे तुमने अपनेआदि।
उदाहरण तुमने यह कार्य नहीं किया है। तुम सो जाओ। तुम्हारे पिताजी क्या काम करते हैं। तू घर देर से क्यों पहुंचा। तुमसे कुछ काम है।
तीसरा अन्य पुरुष जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग किसी अन्य व्यक्ति के लिए किया जाता है उन्हें अन्य पुरुष कहते हैं। जैसे वे यह वह इनका इन्हें उसे उन्होंने इसे उनसेआदि। उदाहरण वे मैच नहीं खेलेंगे। उन्होंने कमरकली है। वह कल विद्यालय नहीं आया था। उससे कुछ मत कहना। उन्हें रोको मत जाने दो। इसे कहिए अपने घर जाएं।
दूसरा निश्चयवाचक सर्वनाम, सर्वनाम के जिस रूप से हमें किसी बात या वस्तु का निश्चित रूप से बहुत होता है उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं।
दूसरे शब्दों में जी सर्वनाम के वक्त के पास या दूर की किसी वस्तु के निश्चय का बोध होता है उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं।
सरल शब्दों में जो सर्वनाम शब्द किसी निश्चित व्यक्ति वस्तु अथवा घटना की ओर संकेत करें उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे यह वहआदि।
उदाहरण पास की वस्तु के लिए यह कोई नया काम नहीं है दूर की वस्तु के लिए रोटी मत खाओ क्योंकि वह जाली है।
तीसरा निश्चयवाचक सर्वनाम, जिस सर्वनाम शब्द से किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु का बोध ना हो उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे कोई कुछ किसी आदि उदाहरण कोई ऐसा ना हो कि कोई आ जाए कुछ उसने कुछ नहीं खाया।
चौथा संबंध वाचक सर्वनाम, जींस सर्वनाम शब्दों का दूसरे सर्वनाम शब्दों से संबंध ज्ञात हो तथा जो शब्द दो वाक्य को जोडा हो उन्हें संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे तू जिसकी सो जिसने जैसा वैसाआदि। उदाहरण जैसा करेगा वैसाभरेगा। जो परिश्रम करते हैं वह सुखी रहते हैं। वह जो ना करे सो थोड़ा।
पांचवा प्रश्न वाचक सर्वनाम, जो सर्वनाम शब्द सवाल पूछने के लिए प्रयुक्त होते हैं उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं। सरल शब्दों में प्रश्न करने के लिए जिन सर्वनाम का प्रयोग होता है उन्हें प्रश्न वाचक सर्वनामकहते हैं। जैसे कौन क्या किसने,
उदाहरण टोकरी में क्या रखा है। बाहर कौन खड़ा है। तुम क्या खा रहे हो। यहां पर ध्यान रखना चाहिए कि कौन का प्रयोग चेतन जीवन के लिए और क्या का प्रयोग जड़ पदार्थों के लिए होता है।
छठ निजवाचक सर्वनाम, निज का अर्थ होता है अपना और वाचन का अर्थ होता है बौद्ध ज्ञान करने वाला अर्थात निजवाचक का अर्थ हुआ अपनेपन का बोध कराना। इस प्रकार जिन सर्वनाम शब्दों काप्रयोग करता के साथ अपनेपन का ज्ञान करने के लिए किया जाए उन्हें निजवाचक सर्वनाम कहते हैं।
जैसे अपने आप निज खुद आदि। आप शब्द का प्रयोग पुरुषवाचक तथा निज वाचक सर्वनाम दोनों में होताहै। उदाहरण आप कल दफ्तर नहीं आए थे। मदन पुरुष आदर्श सूचक आप मेरे पिता श्रीहैं। अन्य पुरुष आदर्श सूचक परिचय देते समय ईश्वर भी इन्हीं का साथ देता है जो अपनी मदद अपने आप करते हैं, वह निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
निजवाचक सर्वनाम का रूप आप है। लेकिन पुरुषवाचक के अन्य पुरुष वाले आपसे इसका प्रयोग बिल्कुल अलग है। यह करता का बोधक है पर स्वयं करता का काम नहीं करता। पुरुषवाचक आप बहुवचन में आधार के लिए प्रयुक्त होता है। जैसे आप मेरे सर आंखों पर हैं आप क्या राय देते हैं किंतु निजवाचक आप एक ही तरह दोनों वचनों में आता है और तीनों पुरुषों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

















सब की पहचान नाम से ही होता है अर्थात सभी का कोई ना कोई नाम अवश्य ही होता है।
नाम को ही संज्ञा कहते हैं आम कई प्रकार के होते हैं। उदाहरण भारत देश का प्रथम राष्ट्रपति का नाम डॉक्टर राजेंद्रप्रसाद है। भारत देश की राजधानी का नाम नई दिल्ली है। विराट कोहली एक प्रसिद्ध भारतीय क्रिकेट खिलाड़ीहै। भारत देश की सबसे पवित्र एवं लंबी नदी का नाम गंगा है। ताजमहल आगरा में स्थितहै।
आदमियों लड़कों के नाम राकेश अनुराग दिनेश और तो लड़कियों के नाम आराध्या कुसुम कृति शहरों के नाम मेरठ दिल्ली आगरा वस्तुओं के नाम पुस्तक पर पंखा खिलौना पशुओं के नाम गाय भैंस शेर पक्षियों के नाम कबूतर तोता मोर फलों के नाम से आम केला देश के नाम जापान चीन पाकिस्तान भारत नदियों का नाम गंगा जमुना नर्मदा इमारत के नाम ताजमहल लाल किला हवामहल दोनों का नाम सोमवार मंगलवार बुधवार , महीना के नाम जनवरी-फरवरी मार्च।














































सामान्य हिंदी प्रवृत्ति बा लिखने की ओर है यही कारण है कि हिंदी शब्दकोश में एक ही शब्द के दोनों रूप दिए गए हैं बांग्ला में तो एक ही ब,व है,व, नहीं। लेकिन, हिंदी में यह स्थिति नहीं है। यहां तो वहन और बहन का अन्तर बतलाने के लिए व, और बा के अस्तित्व को बनाए रखने की आवश्यकता है।
ड़ और ढ़ का उच्चारण हिंदी व्याकरण,
हिन्दी वर्णमाला के ये दो नये वर्ण है, जिनका संस्कृत में अभाव है। हिन्दी में,ड और ढ के नीचे बिन्दु लगाने से इनकी रचना हुई है। वास्तव में ये वेदिक वर्ण क और क्ह के विकसित रूप है। इनका प्रयोग शब्दों के मध्य या अन्त में होता है। इनका उच्चारण करते समय जीभ झटके से ऊपर जाती हैं, इन्हें उश्रिप्प (ऊपर फेंका हुआ) व्यंजन कहते हैं।
जैसे -सड़क,हाड़, गाड़ी, पड़ना पकड़ना, चढ़ाना,गढ़ा।
श_ष-स-का उच्चारण –
ये तीनों उष्म व्यंजन है, क्योंकी इन्हें बोलनें से सांस की उष्मा चलती है। यह संघर्ष व्यंजन है।
श, के उच्चारण में विवाह तालू को स्पष्ट करती है और हवा दोनों बंगलो में स्पर्श करती हुई निकल जाती है पर से के उच्चारण में चूहा मुर्दा को स्पर्श करती है। अत एव तालिब वर्षा लाल भी वर्ण है और मुर्धन सा मूर्धन्य वर्ण है। हिंदी में अब मुर्धन सा का उच्चारण तालिब वर्ष के समान होता है।
ष वर्ण उच्चारण में नहीं है उच्चारण में नहीं है पर लेख में है सामान्य रूप से ष का प्रयोग तत्सम शब्दों में होता है।
जैसे अनुष्ठान विषाद निष्ठा विषम कसाई विषय इत्यादि
श और स के उच्चारण में भेद स्पष्ट है। जहां श, के उच्चारण में जैगुआर तालू को स्पष्ट करती है वहां स के उच्चारण में जिहा दांत को स्पष्ट करती है। श वर्ण समानता संस्कृत फारसी अरबी और अंग्रेजी के शब्दों में पाया जाता है।
जैसे पशु अंश शराब शिक्षा लास्ट स्टेशन कमीशन कश्मीर इत्यादि। हिंदी की बालियां में श ,ष का स्थान स ने ले लिया है।श और स के अशुद्ध उच्चारण से गलत शब्द बन जाते हैं और उनका अर्थ ही बदल जाता है। अर्थ और उच्चारण के अंतर को दिख लाने वाले कुछ उदाहरण इस प्रकार-
अंश (भाग)-अंस (कन्धा)। शकल (खण्ड)सकल सारा।शर (बाण)-सर (तालाब) शंकर (महादेव)संकर (मिश्रित)†।श्रव(कुता)-स्व(अपना)शांत (धैर्य युक्त)-सान्त(अन्त सहित)ड और ढ का उच्चारण –
इसका उच्चारण शब्द के आरंभ में जीवित कोर्ट में और हादसा हुआ के बाद अनुनासिक व्यंजन के सहयोग से होता है। जैसे ढाका डमरू ढाका ढक्कन ढोल शब्द के आरंभ में गढ़ा गढ़ा गढ़ा दिवित में दांत पिंड चंदू मंडप फसल सर्वे सर के पश्चात अनुनासिक व्यंजन केसहयोग पर।
भाषा का सिंपल उदाहरण,
अध्यापिका छात्रों से प्रश्न पूछ रही है और छात्र प्रश्न सुनकर उनका उत्तर दे रहेहैं। बेटा आपका क्या नाम है? मैडम मेरा नाम सुनील है।
बच्चा खिलौने की दुकान के अंदर प्रत्येक खिलौने को ध्यानपूर्वक देख रहा है तथा दुकानदार उसके उससे उसकी पसंद पूछ रहा है।
बेटा आपको कौन सा खिलौना चाहिए अंकल मुझे वह वेट और बोल चाहिए।
मम्मी मुझे बहुत जोर से भूख लगी है। कृपया जल्दी से कुछ खाने कोदीजिए। अच्छा बेटा मैं तुरंत ही आपको गरम-गरम पास्ता बनाकर देता हूं।
पिताजी आप क्या लिख रहे हैं, बेटा मैं आपके चाचा जी को पत्र लिख रहा हूं,
इस प्रकार अपनी बात को दूसरों से खाने तथा दूसरों की कही गई बात को समझने के कुछ तरीके होते हैं। किसी को भाषा कहते हैं। भाषा में हम प्रश्न पूछते हैं, प्रश्नों के उत्तर देते हैं, कुछ सोचते हैं तथा कुछ समझते हैं।
भाषा के रूप बोलना सुना, जब कोई हमसे कुछ बोलता है तो हम उसकी बात को सुनकर उसकी कही गई बात को समझतेहैं। जब कोई कुछ लिखता है तो हम उसे पढ़ कर समझतेहैं। इस प्रकार भाषा के निम्नलिखित दो रूप होते हैं,
एक मौखिक भाषा, मौखिक भाषा के इस रूप में हम अपनी बात को बोलकर प्रकट करते हैं। दूसरा लिखित भाषा, लिखित भाषा के इस रूप में हम अपनी बात को लिखकर प्रकट करतेहैं।
भाषा के कौशल, बोलना सुना लिखना और पढ़ना भाषा के चार कौशलहैं। अपनी बात को दूसरों से खाने तथा दूसरों की कही गई बात को समझने के तरीके को भाषा कहते हैं भाषा के दो रूप हैं एक लिखित तथा दूसरा मौखिक भाषा के चार कौशल है बोलना सुनना लिखना तथा पढ़ना।
वर्ण और वर्णमाला, यह धोनी है इन्हें ही वर्ण कहते हैं उनके और टुकड़े नहीं किया जा सकते हिंदी भाषा के वर्ण के निबंध लिखिए दो भेद होते हैं एक स्वर दूसरा व्यंजन, स्वर हिंदी भाषा में मूल रूप में धारा
ए से अनुस्वार तथा अ: तक : : वर्ण वर्तमान में इन दोनों वालों को भी स्वरों में सम्मिलित कर लिया गया है जबकि यह दोनों वरना तो सवार है और ना ही व्यंजन। व्यंजन हिंदी भाषा के मूल्य रूप से 35 व्यंजन है। अपने ऊपर स्वरों तथा व्यंजनों के कर्म को देखा वर्ण के इसी कर्म को वर्णमाला कहते हैं वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण का स्थान नियत होता है।
वेदवानी जिनके और अधिक टुकड़े नहीं किया जा सकते हैं वरन् कहलाती है। हिंदी भाषा में वर्ण के दो भेद हैं स्वर तथाव्यंजन। वर्णों के निश्चित कर्म को वर्णमाला कहते हैं।
शब्द और वाक्य इसी वर्णमाला के वर्ण आपस में मिलकर शब्दों का निर्माण करते हैं प्रत्येक शब्द का एक निश्चित अर्थ होता है जिस शब्द का कोई अर्थ नहीं होता है वह सब नहीं कहलाता है उदाहरण फल जल इलाज उपयुक्त चित्रों में आपने देखा कि फल एवं जल का एक निश्चित अर्थ होता है अर्थात यह शब्द है परंतु इलाज का कोई अर्थ नहीं है हटा दिया शब्द नहीं है अतः हमें शब्द मनाते समय वर्णों को सही कर्म में प्रयोग करना चाहिए।
वाक्य, हम जानते हैं कि वर्णों के निश्चित मेल से शब्दों का निर्माण होता है। ठीक इसी प्रकार शब्दों के निश्चित मेल से वाक्य का निर्माण होता है यदि शब्दों का क्रम निश्चित नहीं होगा तो बनने वाले वाक्य से कोई अर्थ नहीं निकलेगा।
वर्णों के निश्चित मेल से शब्दों का निर्माण होता है शब्दों के निश्चित में से वाक्य का निर्माण होता है।
दोस्तों आप कल से मैं संज्ञा का आरंभ करने जा रहा हूं ऑप्शन सही से पढ़ाऊंगा गलती हुई होगी तो क्षमा चाहता हूं जय हिंद जय भारत।