प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत उपागम का पर्यवलोकन,

इतिहास में अतीत का चित्र प्रस्तुत रहता है। एक वैज्ञानिक की भांति इतिहासकार को भी उपलब्ध क्यों की समीक्षा करनी पड़ती है और फिर उनका विश्लेषण कर सही चित्रण करना पड़ता है। यह माना जाता है कि भारत की सभ्यता विश्व की पुरानी सभ्यताओं में से एक है जिसमें साहित्य, कला, दर्शन, गणित , विज्ञान, ज्योतिष आदि सभी चीजों का चतुर्थी विकास हुआ है। किंतु यह वस्तु में वैज्ञानिक ढंग से संजोयी नहीं गई है। भारत में अगर किसी चीज की कमी थी तो वह थी वैज्ञानिक पद्धति की। हिंदू जाति ने अपने इतिहास को लिखने में कभी भी ध्यान नहीं दिया। वे अपने कर्म में ही डूबे रहे। हिंदू लोग इतिहास की और विशेष ध्यान नहीं देते। कॉल क्रमानुसार वंश परिचय देने में भी बड़ी असावधानी बरतत और जब उन्हें सूचना देने के लिए विश्व दिवस किया जाता है तब वह लोग किंग करते हुए भी मंद होकर कथाएं कहने लगते हैं। हिंदू जाति के लोग आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। घटनाओं को समय अनुसार कर्मवर नहीं लिखने की उनकी प्रवृत्तियां के कारण हमें उसे समय के सारे इतिहास का पता नहीं चला है।

हमारे समक्ष जो उपलब्ध समक्रिया है उन्हीं को कम अनुसार संग्रहित कर उसे समय के इतिहास को पूर्ण निर्मित किया गया है। हमारे समझ दो प्रकार के स्रोत हैं साहित्यिक सामग्री एवं पुरातात्विय सामग्री मैं भी अभिलेख सिक्का भावनाओं के भर दो सेट क्यों विभिन्न प्रकार के चित्र और मूर्तियां हैं। दिए गए रेखांकित चित्र से हमें इसे भलीभांति समझ सकते हैं।

, साहित्यस् त्रोत इसे हम दो भागों में बाटकर पूर्णतया स्पष्ट कर सकते हैं‌।(1) धार्मिक साहित्य (2) धर्मेंतर साहित्य, धार्मिक साहित्य यह तीन भाग में बांटा हुआ है। 1, ब्राह्मण साहित्य 2, जैन साहित्य 3, बौद्धिक साहित्य,

1, ब्राह्मण साहित्य में सबसे पहले वेदों का स्थान आता है। वेद चार भागों में बाटे हुए हैं।, ऋग्वेद, आयुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, वेद के इन चारों भाग में हमें आर्य सभ्यता की धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक अवस्था का पूरा-पूरा ज्ञान होता है। तुमसे उसे समय की भौगोलिक यानी धरती के क्षेत्रफल वगैरा की भीख जानकारी मिलती है। उसके बारे में कहां है कि, ऋग्वेद सरस्वती नदी के किनारे लगभग एक हाजर पूर्व के पहले लिखा गया था। इसके दोस्तों की संख्या सर्वप्रथम 1017 थी परंतु बाद में 11 सुत और जोड़े गए फल स्वरुप कल सूक्त की संख्या 1028 हो गई। इसमें मित्रों की संख्या 11000 है तथा यह 10 मंडलों में बात हुआ है। विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न समय में लिखे गए ज्ञान का संग्रह है ऋग्वेद। ऋग्वेद से ही हमें यह पता चलता है कि लगभग 800 ही पूर्व लोगों को लोहे की जानकारी हो गई थी। ऋग्वेद का स्वरूप गधात्मक है।

इसके ब्राह्मण ग में क्षेत्र या ब्राह्मण है तथा ब्राह्मणों के पश्चात आरण्यक का स्थान आता है। उसके आरण्यक का नाम एतरेय आरण्यक है।

2, यजुर्वेद, ऋग्वेद के बाद यजूरवेद लिखा गया। इस वेद से हमें उस समय के धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञों तथा उसके विधि  विधान के बारे में पता चलता है। इस वेद के दो भाग हैं।पहला कृष्ण यजुर्वेद तथा दूसरा शुक्ल यजुर्वेद। उसके भी दस मण्डल है। उसके ब्राह्मण ग्रन्थ ़शतपथ ब्राह्मण है।

3, सामवेद, यजुर्वेद के बाद सामवेद लिखा गया। सामवेद का स्वरूप पद्यात्मक है तथा उसके सुक्तो की संख्या 75है एवं1549मंत्र है।यह दोहे की तरह गाकर पढ़ा जाता है।श्रोत्रिय ब्राह्मण इसका पाठ कुशलतापूर्वक करते हैं। उसके ब्राह्मण ग्रन्थ का नाम पचविन्श या ताण्डव ब्राह्मण है।

अथर्ववेद, वेदों के कर्म में सबसे अन्त में अथर्ववेद लिखा गया है। परन्तु इतिहासकारों में उसके बारे में काफी मतभिन्नता है। कुछ इतिहासकार उसे वेदों की श्रेणी में रखते हैं तो कुछ उसे वेदों की श्रेणी से बाहर रखते हैं। उसे वेद मानते ही नहीं है। इस वेद में केवल जादू टोना तथा तंत्र मंत्र वगैरह है। इस वेद का ब्राह्मण ग्रन्थ गोपथ ब्राह्मण है।

इसके बाद आरण्यको का स्थान आता है जो इस प्रकार है -ऐतरेय आरण्यक सांख्यानक आरण्यक, तैयारीय आरण्यक,मैत्राली आरण्यक,यारह्मन्दि वृहदांरण्यक तथा तत्पवकार आरण्यक।

इसके बाद लगभग 108 से भी अधिक उपनिषद लिखे गयेः

जैसे -मडूक्य,ओतरेय,कंठ,केन इत्यादि।

इसके बाद वेदांग लिखे गये जिनकी संख्या छः है-1.शिक्षा 2.कल्प 3.व्याकरण 4.निख्क्त 5.छन्द एवं 6.ज्योतिप।

इसके बाद हम सूत्र साहित्य पाते हैं जो कि तीन भाग में बांटा हुआ है -1.कल्प सूत्र,2.गृह सूत्र तथा 3.धरम सूत्र ।इन तीनों सूत्रों से भारत की सामाजिक.धारमिक एवं सूत्र,2.गृह सूत्र तथा 3.धरम सूत्र।इन तीनों सूत्रों से भारत की सामाजिक.धारमिक एवं राजनीतिक व्यवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

स्मृतियों के बारे में हमें इसके बाद पता चलता है जो मुख्य रूप से दो हे -मनु स्मृति एवं याज्ञवल्क्य स्मृति। इसके बाद दो प्राचीन महाकव्य है।पहला रामायण है जिसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की और दूसरा है महाभारत जिसके रचना वेदव्यास ने की।कहा जाता है कि महाभारत में लगभग 1लाख श्लोक है तथा यह संसार का सबसे बड़ा महाकव्य है। इसके बाद पुराणों के बारे में पता चलता है जिसकी संख्या 18है। प्रत्येक पुराण पांच भागों में विभाजन हैं इसमें अनेक शासको के बारे में पता चलता है।

,, पुराण भारत के तिथिहीन इतिहास के अन्धकूप में आलोक -रशि्म फैलाने का कार्य करता है।

(2) जैन साहित्य -जैनधरम के प्रमुख ग्रंथ श्रुतंग है।ये दो प्रकार के है-(1)अंग एवं (2) पूर्व।अंग की संख्या 12है तथा पूर्व की संख्या 14है। इसके अतिरिक्त महत्वपूर्ण जैन -धरमग्रन्थ है -अचरंग सूत्र, भगवती सूत्र एवं भद्रवाहू चरित।अचरंग सूत्र में भिक्षुओं के लिए आचार संहिता का वर्णन किया गया था तो भगवती सूत्र में महावीर की शिक्षाओं का संग्रह तथा भद्रबाहुचरित में चन्द्रगुप्त मौर्य के बारे में लिखा है। इसके अलावे उस समय की एक और पुस्तक परिशिष्ट पर्वण है जो हेमचंद्र दूआरा लिखी गई हैं।

(3) बौद्ध साहित्य, बौद्ध साहित्य की सबसे प्रमुख रचना है -त्रिपिटका।उस पुस्तक से हमें पहली शताब्दी ई.पू.की जानकारी मिलती है। त्रिपिटक अर्थात सूत -पिटक, धम्म-पिटक एवं विनय -पिटक।सूत -पिटक में बुध्द के धार्मिक विचारों एवं उपदेशों का वर्णन है। धम्म -पिटक में बौद्ध दर्शन तथा विनय -पिटक में बौद्ध संघ के नियम तथा कानून के बारे में लिखा गया है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बौद्ध के जाताको को काफी महत्वपूर्ण माना गया है।जातक -कथा में बुध्द के पिछले जीवन की कहानी है।जातक -कथा के कुल जातकों की संख्या 549है। अन्य महत्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथों में लंका की इतिवृत्त.महावंश एवं द्विपवंश.मिलिन्दपण्हो, महावास्तुललितविस्ततार,दिव्यदान, आर्य मंजूश्रीमूल्प, बुद्धचरित,अंगूतरनिकाय आदि है।मिलिन्दपण्हो में मिलिन्द के प्रश्न तथा नागसेन के जवाब है। अंगूतरनिकाय में हमें छठी शताब्दी ई.पू.के 16 महाजनपदो का वर्णन मिलता है। आर्य मंजूश्रीमूलकल्प में गुप्त सम्राटों का वर्णन है।