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भारत के संविधान का निर्माण एवं उसके स्त्रोत, अध्याय -1, संविधान -सभा स्वशासन अर्थात प्रजातंत्र की देन है।जनता अपने शासन -विधान का निर्माण स्वयं करें,यह प्रजातंत्र का मूलमंत्र है। जनता अपने इस अधिकार का प्रयोग एक विशिष्ट रूप से निर्वाचित या संगठित सभा द्वारा करती हैं, जिसे संविधान -सभा कहते हैं।यह एक ऐसी प्रतिनिध्यात्मक संस्था होती हैं जिसे नवीन संविधान पर विचार करने, अपनाने एवं मौजूदा संविधान में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने का अधिकार रहता है। संविधान -सभा के विचार का व्यवहारिक क्रियान्वयन 17वीं एवं 18वीं सदी की प्रजातंत्रीय क्रांतियों के फलस्वरूप हुआ। इसका सर्वप्रथम क्रियान्वयन 1776ई , में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ जबकि वहां के संविधान बनाने हेतु फिलाडेल्फिया सम्मेलन में संविधान -सभा का गठन किया गया, जिसने 1776ई, से 1787ई, के बीच अमेरिका संविधान का निर्माण किया। फ्रांसीसी क्रांति के बाद वहां की राष्ट्रीय सभा ने 1789-91ई, के बीच वहां के संविधान की रचना कर संविधान -सभा के विचार को परिपक्वता प्रदान की। तत्पश्चात प्रजातंत्र के विकास के साथ प्रय: सभी प्रजातांत्रिक राज्यों के संविधान का निर्माण संविधान -सभा दूआरा किया गया। यह सही है कि ब्रिटिश संविधान के निर्माण के लिए कभी कोई संविधान परिषद् नहीं बैठी तथा वह विकास का एक प्रक्रम है, लेकिन उसके इस प्रक्रम में जनता की पूर्ण सहमति रहा है। भारत में संविधान -सभा का गठन यधापि जुलाई,1946 ई, में हुआ, लेकिन इसकी मांग बहुत पहले से की जा रही थी। भारत में जब से स्वाधीनता आंदोलन ने सक्रिय रूप धारण किया तभी से स्वशासन एवं स्वराज्य की मांग के पीछे यह विचार किसी -न-किसी रूप में अवश्य निहित था कि अपनी वैधानिक व्यवस्था के निर्माण का अधिकार भारतीयों को होना चाहिए तथा यह व्यवस्था वाम्हा -शक्ति दूआरा आरोपित नहीं होनी चाहिए। प्रारम्भ में यह विचार अस्पष्ट एवं असंगठित था, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन की प्रगति के साथ यह ठोस रूप लेने लगा तथा 1934-35 ई, में कांग्रेस ने स्पष्ट शब्दों में संविधान -सभा की मांग की। भारत में संविधान -सभा की मांग की अवधि को दो भागों में बांट सकते हैं – 1, प्रथम भाग (1922-1939ई,): इस अवधि में पहले अस्पष्ट शब्दों में लेकिन बाद में स्पष्ट शब्दों में संविधान सभा की मांग की गयी, लेकिन सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। 2, दिव्तीय भाग (1940-1946ई,): इस अवधि में प्रारम्भ में सैध्दांतिक रूप में तथा बाद में व्यावहारिक रूप में ब्रिटिश सरकार ने संविधान -सभा की मांग को स्वीकार किया तथा के फलस्वरूप 1946ई, में संविधान सभा का गठन हुआ।
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